नाम जप (Naam Jap) दो संस्कृत शब्दों से बना है: "नाम" (Naam) अर्थात् ईश्वर का पवित्र नाम, और "जप" (Jap) अर्थात् बार-बार दोहराना या स्मरण करना। इस प्रकार नाम जप का अर्थ है — भगवान के नाम का निरंतर उच्चारण या मानसिक स्मरण।
यह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे प्राचीन और सबसे सुलभ साधना है। वेदों, उपनिषदों, रामचरितमानस, भगवद्गीता और गुरु ग्रंथ साहिब — सभी ग्रंथों में नाम जप को कलियुग का सबसे सरल मार्ग बताया गया है।
संस्कृत में "जप" शब्द "जप्" धातु से आया है जिसका अर्थ है "बुदबुदाना" या "बार-बार कहना"। भगवद्गीता (10.25) में भगवान कृष्ण कहते हैं: "यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ" (यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि) — जप को सभी यज्ञों में श्रेष्ठ बताया गया है।
चाहे आप इसे नाम जप, मंत्र जप, नाम स्मरण, नाम सिमरन, या जपमाला साधना कहें — मूल भाव एक ही है: ईश्वर के नाम की पवित्र ध्वनि में लीन होना।